Saturday, July 19, 2014

श्रवण कीर्तन स्मरण ही है ,प्रमुख साधन प्यारे।
स्मरण ही को साधना का, प्राण मानो प्यारे।।

सकल दुख का मूल है इक, हरि विमुखता प्यारे।
हरिहि सन्मुखता है याकी, एक औषधि प्यारे।।

स्मरणयुक्त नित रोके माँगो,प्रेम हरि का प्यारे।
उनके सुख को मानु निज सुख लक्ष्य यह रखु प्यारे।।

------जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।

जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाप्रभु के श्रीमुख से:
क्रोध आया कि सर्वनाश हुआ। बदतमीज़ कहने पर 'बदतमीज़' बन गए। आप इतने मूर्ख हैं कि एक मूर्ख ने 'मूर्ख' कह कर आपको मूर्ख बना दिया।

साधक ने अपनी बुद्धि को जब महापुरुष एवं भगवान् के ही हाथ बेचा है , तब उसे अपनी बुद्धि को महापुरुष के आदेश से ही सम्बद्ध रखना चाहिये। लोक में भी देखो , एक कूपमण्डूक अत्यन्त मूर्ख ग्रामीण भी , अपने मुकदमे में किसी व्युत्पन्न वकील के द्वारा प्रमुख कानूनी विषयों को अपनी बुद्धि में रखकर धुरन्धर वकील की जिरह में भी नहीं उखड़ता।
****** श्री महाराज जी।

भजन आज करेंगे, आज पर भी मत टालों। तुरन्त प्रारम्भ कर दो क्योंकि मृत्यु नाम की फाँसी आशा लगाये बैठी है।
.........जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाप्रभु।

DIVINE CHARAN DARSHAN OF SHRI KRIPALU MAHAPRABHU JI... 

RADHEY - RADHEY.

Wednesday, July 9, 2014

हे प्रभु ! मैं तो सदा से ही माया से भ्रमित होकर आपसे विमुख होकर संसार में भटकता रहा। गुरु कृपा से मेरी मोह निद्रा टूटी। उनके इस उपकार के बदले में मैं कंगाल भला कौन सी वस्तु उन्हें अर्पित कर सकता हूँ। क्योंकि गुरु के द्वारा दिये गये ज्ञान के उस शब्द के बदले सम्पूर्ण विश्व की सम्पति भी उन्हें सौंप दी जाय तो भी ज्ञान का मूल्य नहीं चुकाया जा सकता। ज्ञान दिव्य है और सांसारिक पदार्थ मायिक हैं।
--------जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु ।

पंच तत्व अरु अहं का, भेदन करि दे ज्ञान।
पै बिनु भक्ति न करि सके , भेदन प्रकृति महान।।६२।।

भावार्थ- ज्ञानी , ज्ञान से पृथिवी , जल , तेज , वायु एवं आकाश तथा उससे भी परे अहंकार आवरणों का भेदन कर देता है। किन्तु अहंकार से परे २ तत्व महान एवं प्रकृति अवशिष्ट रह जाते हैं। इन दोनों में भी प्रमुख प्रकृति या माया है। यह प्रकृति केवल भक्ति से ही समाप्त की जा सकती है।
भक्ति शतक (दोहा - 62)
-जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
(सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति)

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...