This Blog is dedicated to the Lotus Feet of my Spiritual Master - Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj, who is the Descension of the Bliss of Divine Love, who is illuminating the entire world with light of His Vedic and Yogic knowledge of our Scriptures. Jai Shree Radhey!!!
Saturday, July 19, 2014
साधक
ने अपनी बुद्धि को जब महापुरुष एवं भगवान् के ही हाथ बेचा है , तब उसे
अपनी बुद्धि को महापुरुष के आदेश से ही सम्बद्ध रखना चाहिये। लोक में भी
देखो , एक कूपमण्डूक अत्यन्त मूर्ख ग्रामीण भी , अपने मुकदमे में किसी
व्युत्पन्न वकील के द्वारा प्रमुख कानूनी विषयों को अपनी बुद्धि में रखकर
धुरन्धर वकील की जिरह में भी नहीं उखड़ता।
****** श्री महाराज जी।
****** श्री महाराज जी।
Wednesday, July 9, 2014
हे
प्रभु ! मैं तो सदा से ही माया से भ्रमित होकर आपसे विमुख होकर संसार में
भटकता रहा। गुरु कृपा से मेरी मोह निद्रा टूटी। उनके इस उपकार के बदले में
मैं कंगाल भला कौन सी वस्तु उन्हें अर्पित कर सकता हूँ। क्योंकि गुरु के
द्वारा दिये गये ज्ञान के उस शब्द के बदले सम्पूर्ण विश्व की सम्पति भी
उन्हें सौंप दी जाय तो भी ज्ञान का मूल्य नहीं चुकाया जा सकता। ज्ञान दिव्य
है और सांसारिक पदार्थ मायिक हैं।
--------जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु ।
--------जगद्गुरु श्री कृपालु महाप्रभु ।
पंच तत्व अरु अहं का, भेदन करि दे ज्ञान।
पै बिनु भक्ति न करि सके , भेदन प्रकृति महान।।६२।।
भावार्थ- ज्ञानी , ज्ञान से पृथिवी , जल , तेज , वायु एवं आकाश तथा उससे भी परे अहंकार आवरणों का भेदन कर देता है। किन्तु अहंकार से परे २ तत्व महान एवं प्रकृति अवशिष्ट रह जाते हैं। इन दोनों में भी प्रमुख प्रकृति या माया है। यह प्रकृति केवल भक्ति से ही समाप्त की जा सकती है।
पै बिनु भक्ति न करि सके , भेदन प्रकृति महान।।६२।।
भावार्थ- ज्ञानी , ज्ञान से पृथिवी , जल , तेज , वायु एवं आकाश तथा उससे भी परे अहंकार आवरणों का भेदन कर देता है। किन्तु अहंकार से परे २ तत्व महान एवं प्रकृति अवशिष्ट रह जाते हैं। इन दोनों में भी प्रमुख प्रकृति या माया है। यह प्रकृति केवल भक्ति से ही समाप्त की जा सकती है।
भक्ति शतक (दोहा - 62)
-जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
(सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति)
-जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
(सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति)
खंभ - मणि विहरत सुंदर श्याम |
लखि प्रतिबिंब खंभ – मणि छिन – छिन, किलकत अति अभिराम |
कबहुँ दिखावत दशन मगन मन, रसनहिं कबहुँ ललाम |
कबहुँ दिखावत निज कर अँगुरिन, ‘गूँ गूँ’ करि सुखधाम |
कबहुँक खीझि मार कर ते हरि, कबहुँक मारत पाम |
इमि ‘कृपालु’ रीझत खीझत हरि, रिझवत यशुमति भाम ||
लखि प्रतिबिंब खंभ – मणि छिन – छिन, किलकत अति अभिराम |
कबहुँ दिखावत दशन मगन मन, रसनहिं कबहुँ ललाम |
कबहुँ दिखावत निज कर अँगुरिन, ‘गूँ गूँ’ करि सुखधाम |
कबहुँक खीझि मार कर ते हरि, कबहुँक मारत पाम |
इमि ‘कृपालु’ रीझत खीझत हरि, रिझवत यशुमति भाम ||
भावार्थ – श्यामसुन्दर मणिमण्डित खंभ के पास विहार कर रहे हैं | वे
उन मणिमण्डित खंभों में अपनी परछाई देखकर बार – बार मधुर किलकारी मारते हैं
| कभी तो अपनी ही परछाई को, दूसरा बालक समझकर, आनन्द में विभोर होकर, अपने
दाँत दिखाते हुए चिढ़ाते हैं | कभी इसी प्रकार जिह्वा दिखाते हैं | कभी
“गूँ गूँ” ऐसी मधुर ध्वनि करते हुए हाथों की अँगुलियाँ दिखाते हैं एवं कभी
अपने ही समान सभी संकेत करते हुए देख कर, मणिखम्भ में हाथ से मारते हैं तथा
कभी पैर से भी मारते हैं | ‘श्री कृपालु जी’ के मतानुसार इस प्रकार रीझते –
खीझते हुए, बड़भागिनी यशोदा मैया को रिझा रहे हैं |
( प्रेम रस मदिरा श्री कृष्ण – बाल लीला – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
सर्वाधिकार सुरक्षित - राधा गोविन्द समिति
( प्रेम रस मदिरा श्री कृष्ण – बाल लीला – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
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ए # मनुष्यों ! # मानव_देह प्राप्त हुआ है , # भगवतप्राप्ति के लिये केवल, इसकाे मत गँवाओ, व्यर्थ # भाेग_विलास में केवल लिप्त रह कर...






