Sunday, August 11, 2013

सभी प्राणियों के अंतःकरण में हमारे प्राण वल्लभ श्री कृष्ण का निवास है अतः अपनी कठोर वाणी , या अपने व्यवहार द्वारा किसी को भी दुःखी मत करो !

----जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज।
विपरीत वातावरण मिलने पर भी अंतःकरण विपरीत वातावरण से प्रभावित न हो वो सधाक है !
....... श्री महाराज जी.
यह मन अनादि काल से माया के आधीन है ! अतः अत्यंत मलिन हो गया है ! अतः श्याम प्रेम के अश्रुजल से धोकर इसे निर्मल बना दो !
:::::::::::जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु महाप्रभु::::::::::::
विश्व में चेतन अथवा अचेतन सभी प्राणियों में श्री कृष्ण को देखना ही सिद्धि है।
......श्री कृपालु महाप्रभु जी।
तुम दीनन रखवार हम, अहंकार अवतार.....
अस करू कृपा "कृपालु" अब दीन बनू सरकार...........
भक्ति साधना से ही अंतःकरण शुद्ध होगा तभी दिव्य भक्ति एवं श्री कृष्ण प्राप्ति होगी।
......श्री कृपालु महाप्रभु जी।
श्री कृष्ण एवं आनंद दोनों पर्यायवाची शब्द हैं। विश्व का प्रत्येक व्यक्ति एकमात्र आनंद ही चाहता है। अतः वह आनंद का दास है अतः वह श्री कृष्ण का भी अनजाने में दास ही है।
.......श्री कृपालु महाप्रभु जी।

मन का अटैचमेंट किसमें करें?

एक तमोगुणी, एक रजोगुणी, एक सत्त्वगुणी, एक गुणातीत । ये चार पर्सनैलिटी, चार कक्षाएँ हैं। अगर हमने अपने मन का अटैचमेन्ट तामसी व्यक्ति या तामसी...